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पूछ रही है माटी मेरे हिंदुस्तान की, कब तक सुलगेगी घाटी यूं हिंदुस्तान की

Posted On: 17 Jul, 2017 कविता में

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पूछ रही है माटी मेरे हिन्दुस्तान की,
कब तक सुलगेगी घाटी यूं हिन्दुस्तान की।

धरती के जन्नत पर हाथियारों के​ पेड़​ लगे हैं,
हाथों में गोले बारूद लिये आतंकी भी मासूम बने हैं।
मानवता के जो भक्षक हैं उनका भी मानवाधिकार है,
जिसको चाहिये आजादी ले लो, हिंद की सेना भी जन्नत पहुंचाने को तैयार है।
पूछ रही है माटी मेरे हिन्दुस्तान की, कब तक सुलगेगी घाटी यूं हिन्दुस्तान की।

जो हिन्दुस्तां का होकर भी, हिन्दुस्तां का ना हुआ, उसका जीना भी धिक्कार है,
मातृभूमि की जो करता है इज्ज़त उसको ही रहने का अधिकार है।
मानवता की ऐसी मिशाल ना देखी है दुनिया ने,
कल तक बरसे थे जिन पर पत्थर आज वही सब भुला के ईदी बांट रहे हैं।
सुख हो या दुख हो पर अपना कर्तव्य निभा रहे हैं।

पूछ रही है माटी मेरे हिन्दुस्तान की,
कब तक सुलगेगी घाटी यूं हिन्दुस्तान की |

मासूमों-निर्दोषो के जो कातिल गुनाहगार हैं,
उनकी रक्षा के खातिर भी कुछ विधिवक्ता (वकील) तैयार हैं।
अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया जिसने हिन्दुस्तां की शान में,
उसको हर भारतवासी की तरफ से करबद्ध प्रणाम है।

बांट सको तो बांटना उस मां की पीड़ा को, जिसने पाल-पोष कर भेज दिया सरहद पर अपने लाल को,
कौन दिलायेगा उन बच्चों को गुड्डे-गुडि़या, जिनके दरवाजे पर तिरंगे में लिपट के पहुंची भारत की शान है।

पूछ रही है माटी मेरे हिन्दुस्तान की,
कब तक सुलगेगी घाटी यूं हिन्दुस्तान की।

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